
प्रबंधक का संदेश
अवनीश कुमार सिंह
शिक्षा मनुष्य की मूलभूत आवश्यकता एवं मनुष्यता की प्राणवायु है। वह व्यक्ति में यत्र तत्र फैली संभावनाओं को एकत्र कर उनका समग्रता के साथ प्रस्फुटन करती है तथा मानव को एक जैविक गाड़ी से परिवर्तित परिमार्जित कर सामाजिक प्राणी बनाती है। यह हमारा नैतिक कर्तव्य बनता है कि कोई भी व्यक्ति आत्मा के इस भोजन (शिक्षा) को ग्रहण करने से वंचित ना रह पाए।
शिक्षा मात्र साक्षर बनने की प्रक्रिया नहीं है अपितु यह तो मानव निर्माण की प्रक्रिया है। विकास की प्रक्रिया है। शिक्षा संस्थानों एवं शिक्षकों का परम कर्तव्य है कि वे शिक्षा को गुणवत्तापरक, मूल्ययुक्त एवं निश्चित संभावनाशील बनाने के लिए जुट जाएं। शिक्षा ऐसी हो जो भूख भले ही ना मिटा सके किंतु अपनी रोटी बांटना सिखा दें। यह मनुष्य को कुछ भी बनाने से पहले मनुष्य अवश्य बना दे। महान शायर मिर्जा गालिब ने ठीक ही कहा है “आदमी को मयस्सर नहीं इंसा होना” ।
“भाग्यवाद अभिशाप है कर्म वाद वरदान” । अतः हमें कर्मनिष्ठ होना चाहिए और सफलता के शीर्ष पर पहुंचने में विश्वास रखते हुए तब तक अनवरत परिश्रम करते रहना चाहिए जब तक हर असंभव लक्ष्य भी संभव में परिणत ना हो जाए।
महाविद्यालय इन्हीं भावों विचारों एवं उद्देश्यों की पूर्ति हेतु प्रतिबद्ध है।
बुझुंगा नहीं आंधियां रोज लाओ।
जला हूं तो जलकर उजाला करूंगा।।
रुकूंगा नहीं लाख भीतें बनाओ।
चला हूं तो चल कर बसेरा करूंगा।।